सुप्रीम कोर्ट में आनंद मोहन मामले की सुनवाई के बाद बहस तेज, कई प्रश्न फिर बने चर्चा का विषय
Posted on July 26, 2026 by
BiharTalkies
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सुप्रीम कोर्ट में आनंद मोहन मामले की सुनवाई के बाद बहस तेज, कई प्रश्न फिर बने चर्चा का विषय
नई दिल्ली। पूर्व सांसद आनंद मोहन से जुड़े चर्चित कृष्णैया कांड में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी होने के बाद मामले को लेकर सार्वजनिक और राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। विभिन्न पक्षों की ओर से ऐसे कई प्रश्न उठाए जा रहे हैं, जिन पर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं।
बहस के दौरान सबसे अधिक चर्चा इस बात की हुई कि घटना के प्रत्यक्षदर्शी बताए जाने वाले तत्कालीन जिलाधिकारी जी. कृष्णैया के अंगरक्षक और चालक ने न्यायालय में अपनी गवाही के दौरान कथित रूप से कहा था कि घटनास्थल पर आनंद मोहन मौजूद नहीं थे। इस आधार पर सवाल उठाया जा रहा है कि यदि ऐसा था, तो दोषसिद्धि का आधार क्या रहा।
इसी क्रम में यह प्रश्न भी उठाया जा रहा है कि घटना के समय कृष्णैया के साथ मौजूद फोटोग्राफर श्री टांगड़ी तथा अन्य सार्वजनिक गवाहों को अभियोजन पक्ष ने अदालत में क्यों पेश नहीं किया। कुछ लोगों का तर्क है कि यदि इन गवाहों की गवाही उपलब्ध नहीं कराई गई, तो उसके कारणों पर भी चर्चा होनी चाहिए।
मामले से जुड़े एक अन्य मुद्दे में एफआईआर का हवाला देते हुए कहा जा रहा है कि 36 लोगों को नामजद तथा लगभग 3500 लोगों को अज्ञात अभियुक्त बनाया गया था। बहस में यह सवाल भी उठाया गया कि यदि अधिकांश अभियुक्त बरी हो गए, तो भड़काऊ भाषण के आरोप में अकेले आनंद मोहन की दोषसिद्धि किन साक्ष्यों के आधार पर हुई।
सुनवाई के बाद कुछ पक्षों ने यह भी कहा कि यदि यह मामला इतना महत्वपूर्ण था, तो उस समय लोकसभा में उठाई गई न्यायिक अथवा सीबीआई जांच की मांग पर आगे कार्रवाई क्यों नहीं हुई। साथ ही तत्कालीन परिस्थितियों में विभिन्न संस्थाओं की भूमिका को लेकर भी प्रश्न उठाए जा रहे हैं।
बहस के दौरान सरकारी अभिलेखों में दर्ज समय को लेकर भी चर्चा हुई। एक पक्ष का दावा है कि विभिन्न अधिकारियों के अभिलेखों में दर्ज समय के आधार पर घटनाक्रम की समय-सीमा को लेकर सवाल खड़े होते हैं। इसी प्रकार चिकित्सकीय अभिलेखों और पोस्टमार्टम से जुड़े तथ्यों पर भी अलग-अलग व्याख्याएं सामने रखी गईं।
सुप्रीम कोर्ट में हुई बहस के बाद यह मामला एक बार फिर सार्वजनिक विमर्श का विषय बन गया है।
नई दिल्ली। पूर्व सांसद आनंद मोहन से जुड़े चर्चित कृष्णैया कांड में सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई पूरी होने के बाद मामले को लेकर सार्वजनिक और राजनीतिक बहस एक बार फिर तेज हो गई है। विभिन्न पक्षों की ओर से ऐसे कई प्रश्न उठाए जा रहे हैं, जिन पर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आ रहे हैं।
बहस के दौरान सबसे अधिक चर्चा इस बात की हुई कि घटना के प्रत्यक्षदर्शी बताए जाने वाले तत्कालीन जिलाधिकारी जी. कृष्णैया के अंगरक्षक और चालक ने न्यायालय में अपनी गवाही के दौरान कथित रूप से कहा था कि घटनास्थल पर आनंद मोहन मौजूद नहीं थे। इस आधार पर सवाल उठाया जा रहा है कि यदि ऐसा था, तो दोषसिद्धि का आधार क्या रहा।
इसी क्रम में यह प्रश्न भी उठाया जा रहा है कि घटना के समय कृष्णैया के साथ मौजूद फोटोग्राफर श्री टांगड़ी तथा अन्य सार्वजनिक गवाहों को अभियोजन पक्ष ने अदालत में क्यों पेश नहीं किया। कुछ लोगों का तर्क है कि यदि इन गवाहों की गवाही उपलब्ध नहीं कराई गई, तो उसके कारणों पर भी चर्चा होनी चाहिए।
मामले से जुड़े एक अन्य मुद्दे में एफआईआर का हवाला देते हुए कहा जा रहा है कि 36 लोगों को नामजद तथा लगभग 3500 लोगों को अज्ञात अभियुक्त बनाया गया था। बहस में यह सवाल भी उठाया गया कि यदि अधिकांश अभियुक्त बरी हो गए, तो भड़काऊ भाषण के आरोप में अकेले आनंद मोहन की दोषसिद्धि किन साक्ष्यों के आधार पर हुई।
सुनवाई के बाद कुछ पक्षों ने यह भी कहा कि यदि यह मामला इतना महत्वपूर्ण था, तो उस समय लोकसभा में उठाई गई न्यायिक अथवा सीबीआई जांच की मांग पर आगे कार्रवाई क्यों नहीं हुई। साथ ही तत्कालीन परिस्थितियों में विभिन्न संस्थाओं की भूमिका को लेकर भी प्रश्न उठाए जा रहे हैं।
बहस के दौरान सरकारी अभिलेखों में दर्ज समय को लेकर भी चर्चा हुई। एक पक्ष का दावा है कि विभिन्न अधिकारियों के अभिलेखों में दर्ज समय के आधार पर घटनाक्रम की समय-सीमा को लेकर सवाल खड़े होते हैं। इसी प्रकार चिकित्सकीय अभिलेखों और पोस्टमार्टम से जुड़े तथ्यों पर भी अलग-अलग व्याख्याएं सामने रखी गईं।
सुप्रीम कोर्ट में हुई बहस के बाद यह मामला एक बार फिर सार्वजनिक विमर्श का विषय बन गया है।
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