भाजपा नेत्री की 'कागजी' पार्टी के खाते में उड़कर आए ₹620 करोड़: BJP प्रदेश उपाध्यक्ष ने वकील पर फोड़ा भ�
Posted on September 06, 2026 by
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भाजपा नेत्री की 'कागजी' पार्टी के खाते में उड़कर आए ₹620 करोड़: BJP प्रदेश उपाध्यक्ष ने वकील पर फोड़ा भंडाफोड़ का बम, 'गंगाजली' शुचिता पर उठे तीखे सवाल
नई दिल्ली / पटना / अहमदाबाद | डिजिटल डेस्क:
राजनीतिक गलियारों में वित्तीय पारदर्शिता और 'गंगाजली' शुचिता का ढोल पीटने वाले दावों की धज्जियां उड़ाता हुआ एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने चुनावी फंडिंग के नाम पर चल रहे फर्जीवाड़े को बेनकाब कर दिया है। बीबीसी (BBC) की एक हालिया खोजी रिपोर्ट के उजागर होने के बाद देश के राजनीतिक और आर्थिक हलकों में ज़बरदस्त भूचाल आ गया है।
मामला एक ऐसी गुमनाम रजिस्टर्ड अनरिकॉग्नाइज्ड पॉलिटिकल पार्टी (RUPP) का है, जिसका ना कोई वास्तविक दफ्तर है और ना ही जिसे देश की जनता जानती थी। लेकिन इसके बैंक खाते में रातों-रात ₹620 करोड़ की अकल्पनीय धनराशि उड़कर आ पहुंची।
₹20 हजार से ₹620 करोड़ तक का 'अविश्वसनीय' सफर
सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, वर्ष 2020 में अस्तित्व में आई 'आम जनमत पार्टी' का कुल चंदा शुरुआती दो सालों में महज ₹20,000 था। लेकिन इसके बाद इस पार्टी पर ऐसी 'अदृश्य कृपा' बरसी कि 2022-23 में इसका चंदा बढ़कर ₹216 करोड़ और वित्तीय वर्ष 2023-24 में ₹620 करोड़ के पार पहुंच गया।
हैरानी की बात यह है कि देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को मिले कुल वार्षिक चंदे (लगभग ₹281 करोड़) से दोगुने से भी अधिक रकम जुटाने वाली इस पार्टी ने 2024 के पूरे लोकसभा चुनाव में महज 1 प्रत्याशी मैदान में उतारा था।
BJP नेत्री, गायब दफ्तर और 'वकील' का अजीबो-गरीब बहाना
इस कागजी पार्टी की संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में अनामिका पासवान का नाम दर्ज है, जो वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की बिहार प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। मीडिया और बीबीसी की रिपोर्टिंग के बाद जब इस बेहिसाब संपत्ति पर उनसे सवाल पूछे गए, तो उनका जवाब किसी हास्य-नाटक की स्क्रिप्ट जैसा प्रतीत हुआ:
रुपये कहां से आए, कोई खबर नहीं: भाजपा नेत्री का दावा है कि वह एकदम निष्कलंक और अनजान हैं। उन्हें नहीं मालूम कि ₹620 करोड़ कहां से आए, किसने दिए और कहां चले गए।
वकील को सौंपा इस्तीफा: भारतीय राजनीति के इतिहास का यह शायद पहला अनोखा मामला है, जहां किसी पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष ने अपना इस्तीफा चुनाव आयोग या कार्यकर्ताओं को देने के बजाय अपने दिल्ली वाले वकील को सौंप दिया। नेत्री का कहना है कि वकील ने उनसे सादे कागजों पर दस्तखत करवा लिए थे और उन्हें अंधेरे में रखकर पार्टी का हस्तांतरण पटना से अहमदाबाद कर दिया।
शेल कंपनियों और टैक्स चोरी का 'अड्डा'?
अहमदाबाद के जिस पते पर पार्टी का मुख्यालय दिखाया गया है, जांच में वह जगह महीनों से बंद पड़ी पाई गई। वित्तीय विशेषज्ञों और जांच एजेंसियों के सूत्रों का मानना है कि यह पूरा नेटवर्क चार्टर्ड अकाउंटेंट्स (CAs) और शेल कंपनियों के माध्यम से आयकर अधिनियम की धारा 80GGC के तहत 100% टैक्स छूट का फायदा उठाने और काले धन को सफेद (Money Laundering) करने का संगठित सिंडिकेट हो सकता है।
5 बड़े सवाल जो तंत्र पर खड़े होते हैं:
क्या महज "वकील ने धोखा दिया" कह देने से ₹620 करोड़ के संदिग्ध लेनदेन की नैतिक और कानूनी जवाबदेही खत्म हो जाती है?
सत्ताधारी दल की प्रदेश उपाध्यक्ष जिस पार्टी की सर्वेसर्वा थीं, क्या उसमें इतने बड़े वित्तीय हेरफेर की भनक केंद्रीय जांच एजेंसियों (ED/IT) को नहीं लगी?
बिना किसी जनाधार, संगठन या चुनाव लड़ने वाली एक 'कागजी' पार्टी के खाते में सैकड़ों करोड़ रुपये कहां से और क्यों आ रहे थे?
क्या 'रजिस्टर्ड अनरिकॉग्नाइज्ड पॉलिटिकल पार्टीज' (RUPP) देश में टैक्स चोरी का सबसे सुरक्षित और वैध जरिया बन चुकी हैं?
पारदर्शिता का दावा करने वाला चुनाव आयोग ऐसे फर्जी राजनीतिक दलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने से अब तक क्यों कतरा रहा है?
इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि चुनावी फंडिंग के नाम पर शुचिता का नकाब ओढ़े राजनीतिक तंत्र के भीतर किस कदर दलदल व्याप्त है। अब देखना यह होगा कि इस खुलासे के बाद चुनाव आयोग और आयकर विभाग कोई ठोस कार्रवाई करते हैं या मामला बयानों की धूल में दबा दिया जाएगा।
नई दिल्ली / पटना / अहमदाबाद | डिजिटल डेस्क:
राजनीतिक गलियारों में वित्तीय पारदर्शिता और 'गंगाजली' शुचिता का ढोल पीटने वाले दावों की धज्जियां उड़ाता हुआ एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने चुनावी फंडिंग के नाम पर चल रहे फर्जीवाड़े को बेनकाब कर दिया है। बीबीसी (BBC) की एक हालिया खोजी रिपोर्ट के उजागर होने के बाद देश के राजनीतिक और आर्थिक हलकों में ज़बरदस्त भूचाल आ गया है।
मामला एक ऐसी गुमनाम रजिस्टर्ड अनरिकॉग्नाइज्ड पॉलिटिकल पार्टी (RUPP) का है, जिसका ना कोई वास्तविक दफ्तर है और ना ही जिसे देश की जनता जानती थी। लेकिन इसके बैंक खाते में रातों-रात ₹620 करोड़ की अकल्पनीय धनराशि उड़कर आ पहुंची।
₹20 हजार से ₹620 करोड़ तक का 'अविश्वसनीय' सफर
सरकारी दस्तावेजों के मुताबिक, वर्ष 2020 में अस्तित्व में आई 'आम जनमत पार्टी' का कुल चंदा शुरुआती दो सालों में महज ₹20,000 था। लेकिन इसके बाद इस पार्टी पर ऐसी 'अदृश्य कृपा' बरसी कि 2022-23 में इसका चंदा बढ़कर ₹216 करोड़ और वित्तीय वर्ष 2023-24 में ₹620 करोड़ के पार पहुंच गया।
हैरानी की बात यह है कि देश की सबसे पुरानी राष्ट्रीय पार्टी कांग्रेस को मिले कुल वार्षिक चंदे (लगभग ₹281 करोड़) से दोगुने से भी अधिक रकम जुटाने वाली इस पार्टी ने 2024 के पूरे लोकसभा चुनाव में महज 1 प्रत्याशी मैदान में उतारा था।
BJP नेत्री, गायब दफ्तर और 'वकील' का अजीबो-गरीब बहाना
इस कागजी पार्टी की संस्थापक और राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में अनामिका पासवान का नाम दर्ज है, जो वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की बिहार प्रदेश उपाध्यक्ष हैं। मीडिया और बीबीसी की रिपोर्टिंग के बाद जब इस बेहिसाब संपत्ति पर उनसे सवाल पूछे गए, तो उनका जवाब किसी हास्य-नाटक की स्क्रिप्ट जैसा प्रतीत हुआ:
रुपये कहां से आए, कोई खबर नहीं: भाजपा नेत्री का दावा है कि वह एकदम निष्कलंक और अनजान हैं। उन्हें नहीं मालूम कि ₹620 करोड़ कहां से आए, किसने दिए और कहां चले गए।
वकील को सौंपा इस्तीफा: भारतीय राजनीति के इतिहास का यह शायद पहला अनोखा मामला है, जहां किसी पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष ने अपना इस्तीफा चुनाव आयोग या कार्यकर्ताओं को देने के बजाय अपने दिल्ली वाले वकील को सौंप दिया। नेत्री का कहना है कि वकील ने उनसे सादे कागजों पर दस्तखत करवा लिए थे और उन्हें अंधेरे में रखकर पार्टी का हस्तांतरण पटना से अहमदाबाद कर दिया।
शेल कंपनियों और टैक्स चोरी का 'अड्डा'?
अहमदाबाद के जिस पते पर पार्टी का मुख्यालय दिखाया गया है, जांच में वह जगह महीनों से बंद पड़ी पाई गई। वित्तीय विशेषज्ञों और जांच एजेंसियों के सूत्रों का मानना है कि यह पूरा नेटवर्क चार्टर्ड अकाउंटेंट्स (CAs) और शेल कंपनियों के माध्यम से आयकर अधिनियम की धारा 80GGC के तहत 100% टैक्स छूट का फायदा उठाने और काले धन को सफेद (Money Laundering) करने का संगठित सिंडिकेट हो सकता है।
5 बड़े सवाल जो तंत्र पर खड़े होते हैं:
क्या महज "वकील ने धोखा दिया" कह देने से ₹620 करोड़ के संदिग्ध लेनदेन की नैतिक और कानूनी जवाबदेही खत्म हो जाती है?
सत्ताधारी दल की प्रदेश उपाध्यक्ष जिस पार्टी की सर्वेसर्वा थीं, क्या उसमें इतने बड़े वित्तीय हेरफेर की भनक केंद्रीय जांच एजेंसियों (ED/IT) को नहीं लगी?
बिना किसी जनाधार, संगठन या चुनाव लड़ने वाली एक 'कागजी' पार्टी के खाते में सैकड़ों करोड़ रुपये कहां से और क्यों आ रहे थे?
क्या 'रजिस्टर्ड अनरिकॉग्नाइज्ड पॉलिटिकल पार्टीज' (RUPP) देश में टैक्स चोरी का सबसे सुरक्षित और वैध जरिया बन चुकी हैं?
पारदर्शिता का दावा करने वाला चुनाव आयोग ऐसे फर्जी राजनीतिक दलों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करने से अब तक क्यों कतरा रहा है?
इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि चुनावी फंडिंग के नाम पर शुचिता का नकाब ओढ़े राजनीतिक तंत्र के भीतर किस कदर दलदल व्याप्त है। अब देखना यह होगा कि इस खुलासे के बाद चुनाव आयोग और आयकर विभाग कोई ठोस कार्रवाई करते हैं या मामला बयानों की धूल में दबा दिया जाएगा।
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