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नीतीश कुमार बर्खास्त? मंडल को कमंडल ने कुचला..

Posted on May 31, 2026 by BiharTalkies
News and Politics
नीतीश कुमार बर्खास्त? मंडल को कमंडल ने कुचला..
"नीतीश कुमार बर्खास्त! मंडल को कमंडल ने कुचला" — 'सरस सलिल' पत्रिका के कवर पर छपी यह तीखी हेडलाइन इस समय बिहार के सियासी गलियारों में सबसे बड़ा चर्चा का विषय बन चुकी है। सोशल मीडिया से लेकर पटना के राजनीतिक दफ्तरों तक, इस एक शीर्षक ने नए विवाद और राजनीतिक कयासों को जन्म दे दिया है।

पटना: बिहार की राजनीति में एक बार फिर वैचारिक और रणनीतिक घमासान तेज हो गया है। हाल ही में जेडीयू (JDU) के वरिष्ठ नेताओं द्वारा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को दिल्ली प्रेस की प्रसिद्ध हिंदी पत्रिका 'सरस सलिल' का एक अंक सौंपा गया, जिसके कवर पेज पर नीतीश कुमार की तस्वीर के साथ बड़े अक्षरों में लिखा था— "नीतीश कुमार बर्खास्त! मंडल को कमंडल ने कुचला"।

इस तीखे और विवादास्पद शीर्षक ने राज्य में एक नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। रिपोर्टों के अनुसार, जब जेडीयू नेताओं ने मुख्यमंत्री को यह मैगजीन दिखाई, तो उन्होंने बेहद गंभीरता से इस कवर को देखा और पढ़ा। इसके बाद उन्होंने अपने एमएलसी ललन सर्राफ को यह प्रति सौंपते हुए कहा, "इसे रखिए और इनसे बात कराइएगा।"

मंडल राजनीति का चेहरा: नीतीश कुमार को पारंपरिक रूप से बिहार में 'मंडल राजनीति' (पिछड़े, अति-पिछड़े और सामाजिक न्याय के समीकरण) का सबसे मजबूत स्तंभ माना जाता रहा है। उन्होंने जातीय गणना और आरक्षण के दायरे को बढ़ाकर खुद को इस राजनीति के केंद्र में बनाए रखा।

कमंडल की बढ़ती ताकत: 'कमंडल' शब्द का इस्तेमाल बीजेपी की 'हिंदुत्व और राष्ट्रवाद' की राजनीति के लिए किया जाता है। हालिया राजनीतिक घटनाक्रमों और गठबंधनों के बदलाव के बाद, विश्लेषकों का मानना है कि बीजेपी का राष्ट्रवाद और हिंदुत्व का एजेंडा क्षेत्रीय ताकतों पर भारी पड़ रहा है।

पत्रिका के इस लेख में इसी बात का विश्लेषण किया गया है कि कैसे नए राजनीतिक समीकरणों के बीच नीतीश कुमार की स्वतंत्र 'मंडल राजनीति' का प्रभाव कमजोर हुआ है और बीजेपी की 'कमंडल राजनीति' ने उन्हें वैचारिक रूप से बैकफुट पर धकेल दिया है। यहाँ 'बर्खास्त' शब्द का प्रयोग उनके वास्तविक पद के लिए नहीं, बल्कि उनके पुराने राजनीतिक रसूख और आक्रामकता के खत्म होने पर तंज कसने के लिए किया गया है।

इस कवर पेज के वायरल होते ही विपक्षी दलों, खासकर राष्ट्रीय जनता दल (RJD) को नीतीश कुमार पर हमला करने का एक और मौका मिल गया है। विपक्ष का कहना है कि नीतीश कुमार ने जिस 'सामाजिक न्याय' की लड़ाई से अपनी पहचान बनाई थी, आज उसी विचारधारा को उन्होंने बीजेपी के हाथों गिरवी रख दिया है।

राजद के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि यह हेडलाइन आज के बिहार की कड़वी सच्चाई को बयां करती है, जहाँ मुख्यमंत्री की कुर्सी भले ही नीतीश कुमार के पास हो, लेकिन नीति और नियंत्रण पूरी तरह से 'कमंडल' यानी भाजपा के हाथों में जा चुका है।

जेडीयू ने इस रिपोर्ट और हेडलाइन पर कड़ी आपत्ति जताई है। जेडीयू नेताओं का मानना है कि यह मुख्यमंत्री की छवि को धूमिल करने और गठबंधन में दरार पैदा करने की एक सोची-समझी कोशिश है। नीतीश कुमार का अपने एमएलसी को इस मामले में 'बात करने' का निर्देश देना यह साफ करता है कि मुख्यमंत्री इस तरह के आख्यानों (narratives) को हल्के में लेने के मूड में नहीं हैं।

बिहार इस समय एक बेहद संवेदनशील राजनीतिक मोड़ पर है। एक तरफ राबड़ी देवी के आवास को लेकर चल रहा विवाद और दूसरी तरफ मुख्यमंत्री की साख पर उठते यह वैचारिक सवाल, आने वाले समय में राज्य की राजनीति को नया मोड़ दे सकते हैं। देखना दिलचस्प होगा कि 'मंडल' के इस सबसे अनुभवी खिलाड़ी के पास 'कमंडल' के बढ़ते प्रभाव और मीडिया के इस तीखे प्रहार का क्या जवाब है।
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